एक बचपन का डर
उस दरवाज़े के नीचे से हमेशा ठंडी हवा आती थी।
हवा में एक अजीब-सी गंध होती थी — पुराने लकड़ी के गीलेपन की, या शायद किसी भुला दिए गए वक्त की।
किसी ने कहा था, "वो दरवाज़ा कभी मत खोलना... वहां एक बार कोई बच्चा चला गया था, फिर नहीं लौटा..."
किसी और ने जोड़ दिया, "उस कमरे में वो कंकाल हैं ना, उन्हीं की आत्मा घूमती है।"
हम बच्चे तो बस रोज़ गुज़रते थे उस रास्ते से,
मगर नज़रें झुकाकर।
कभी कोई चिल्ला दे — "देखो! वो दरवाज़ा हिल रहा है!" —
तो सब भाग जाते थे, बस्ता गिराकर, चप्पल छोड़कर।
कई बार ख्वाहिश भी होती थी –
कि एक बार झाँक लें उस दरवाज़े के पीछे की दुनिया में।
क्या है वहां? अंधेरा? कोई बक्सा? कोई पुराना skeleton?
या फिर कुछ नहीं... बस हमारी कल्पनाओं की परछाई?
पर आज, इतने सालों बाद, जब वो स्कूल एक बार फिर देखने गया,
तो वो दरवाज़ा अब भी वहीं था —
जैसे वक़्त वहीं ठहर गया हो।
मैंने झाँकने की हिम्मत की...
वो दरवाज़ा अब भी बंद था, पर डर नहीं था।
अब वहां बस एक पुराना झाड़ू पड़ा था, टूटी टेबल, और दीवारों पर धूल।
और समझ आया —
डर कभी उस दरवाज़े के पीछे नहीं था, वो तो हमारे अंदर था।
बचपन का, मासूमियत का, और कहानियों का…

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